जैन धर्म के संस्थापक कौन थे ?

जैन धर्म के संस्थापक कौन थे ? आइये जानते हैं इसके असली संस्थापक।

 जैन धर्म के मूल संस्थापक और प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव अन्य नाम आदिनाथ थे।इन्होंने ही इस युग में सबसे पहले जैन धर्म के आध्यात्मिक मार्ग की नींव रखी थी। इनका उल्लेख हिंदू धर्म के ऋग्वेद और श्रीमद्भागवत पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है। हालांकि, इसका वास्तविक संस्थापक महावीर स्वामी ( जो 24वें तीर्थकर थे। ) को माना जाता है जिन्हें इस धर्म को व्यापक रूप दिया। इनका जन्म 540 ईसा पूर्व (या 599 ईसा पूर्व) वैशाली के कुंडग्राम में हुआ था।

जैन धर्म का प्राचीन नाम श्रमण धर्म या निर्ग्रन्थ धर्म है। इसके अलावा इसे र्जिनागम या जिन धर्म भी कहा जाता है, क्योंकि यह 'जिन' (अर्थात मन और इंद्रियों को जीतने वाले) भगवान की शिक्षाओं पर आधारित है।यह धर्म अपने अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह (संतुष्टि) के सिद्धांतों के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जैन धर्म के संस्थापक कौन थे?

अक्सर लोग इस बात को लेकर असमंजस (confusion) में रहते हैं। आइए आज के इस ब्लॉग में हम इस रहस्य से पर्दा उठाते हैं और जैन धर्म के स्थापना इतिहास को आसान शब्दों में समझते हैं।

जैन धर्म के संस्थापक

जैन धर्म का इतिहास

जैन धर्म दुनिया के प्राचीन धर्मों में से एक है जिसके मूल में 24 तीर्थंकर रहे हैं। जैन धर्म की उत्पत्ति अनादि काल से मानी जाती है, लेकिन इसका ऐतिहासिक और वास्तविक विकास छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भगवान महावीर और प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ (आदिनाथ) के माध्यम से हुआ। 

जैन धर्मावलंबियों के अनुसार जैन धर्म की प्राचीनता प्रागैतिहासिक है। उनके अनुसार मोहनजोदड़ो से प्राप्त योगी की मूर्ति इससे आदि प्रवर्त्तक प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव की है। यही नहीं, वेदों में उल्लिखित कतिपय नामों को जैन तीर्थंकरों के नामों के साथ जोड़ा जाता है। ऋग्वेद के एक स्थल पर 'ऋषभ' शब्द आया है। जिसे 'ऋषभदेव' के साथ समीकृत किया जाता है। यजुर्वेद में भी उल्लिखित है कि "ऋषभ धर्मप्रवर्तकों में श्रेष्ठ है।” अथर्ववेद और गोपथ ब्राह्मण में संकेतित स्वयंभू काश्यप का तादात्म्य ऋषभदेव से किया जाता है। वैसे, ऋषभदेव का उल्लेख 'श्रीम‌द्भागवत' में भी हुआ है, जहाँ उनके उदात्त उपदेश और सिद्धांत संकलित हैं। किन्तु किसी ठोस प्रमाण के अभाव में इन कथनों को युक्तियुक्त नहीं माना जा सकता। यह सही है कि सभी दर्शनों के मूल तत्त्व वेदों और उपनिषदों में मिलते हैं जिसके आधार पर विद्वानों ने अपने-अपने विचारों और दार्शनिक सिद्धांतों का प्रचलन किया है।

जैन धर्म का सिद्धान्त और नियम

जैन धर्म के मुख्य सिद्धांत अहिंसा, सत्य और अपरिग्रह हैं। इनका मुख्य उद्देश्य आत्मा को शुद्ध करना और मोक्ष प्राप्त करना है। जैन धर्म के सिद्धान्तों में निवृत्ति मार्ग का प्रधान स्थान है, जिसके माध्यम से व्यक्ति जगत् की नाना प्रकार की व्याधियों और तृष्णाओं से विमुक्त हो जाता है। प्रवृत्ति और वांछा में लिप्त व्यक्ति सुख और समृद्धि के लिए सर्वदा भोग और तृष्णा में व्यस्त रहता है। सांसारिक वस्तुओं को अधिकाधिक प्राप्त करने से भी उसे संतोष नहीं मिलता। उसकी वांछा और अभिलाषा तीव्र होती जाती है। अतः जगत् के समस्त सुख दुःख के कारण हैं। प्रवृत्ति का त्याग करके निवृत्ति का अनुपालन ही वास्तविक और स्थायी सुख का मूल है। परिव्राजक की स्थिति में ही शान्ति प्राप्त होती है, जब मनुष्य समस्त सुखोपभोग से अलग होकर निवृत्ति की ओर बढ़ता है।

जैन ज्ञान-तत्त्व के अन्तर्गत कर्म का सिद्धान्त महत्त्वपूर्ण है। सत् और असत् कर्म से ही बन्धन और मुक्ति होती है। संसार में कर्म ही प्रधान है। ईश्वर का कोई निर्देश नहीं है, न तो वह जगत् स्त्रस्टा ही है। पाप और पुण्य मनुष्य के कर्मों से होते हैं, ईश्वर से नहीं। इस प्रकार जैन धर्म के अन्तर्गत ईश्वर को न मानकर मनुष्य के कर्म को ही प्रधानता दी गई है। उन्हें अपने कर्मों का स्वयं ही उत्तरदायी माना गया है।

पंच महाव्रत एवं नैतिक नियम

  • अहिंसा: किसी भी जीव को मन, वचन या कर्म से नुकसान न पहुँचाना।
  • सत्य: हमेशा सच बोलना।
  • अस्तेय: चोरी न करना।
  • ब्रह्मचर्य: पवित्रता का पालन करना।
  • अपरिग्रह: सांसारिक वस्तुओं से मोह या संग्रह न रखना।
जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर हुए हैं, जिनके नाम, उनके प्रतीक चिन्ह और निर्वाण स्थल की सूची नीचे कॉलम (तालिका) में दी गई है:

क्रम संख्या

तीर्थंकर का नाम

प्रतीक चिन्ह (लांछन)

निर्वाण स्थल (मोक्ष स्थान)

1

 ऋषभदेव (आदिनाथ)

बैल (वृषभ)

अष्टापद (कैलाश पर्वत)

2

 अजितनाथ

हाथी

सम्मेद शिखरजी

3

 संभवनाथ

घोड़ा

सम्मेद शिखरजी

4

 अभिनंदननाथ

बंदर

सम्मेद शिखरजी

5

 सुमतिनाथ

चकवा (क्रौंच पक्षी)

सम्मेद शिखरजी

6

 पद्मप्रभ

कमल

सम्मेद शिखरजी

7

सुपार्श्वनाथ

स्वास्तिक

सम्मेद शिखरजी

8

 चन्द्रप्रभ

चन्द्रमा

सम्मेद शिखरजी

9

 सुविधिनाथ (पुष्पदन्त)

मगरमच्छ

सम्मेद शिखरजी

10

 शीतलनाथ

कल्पवृक्ष (या श्रीवत्स)

सम्मेद शिखरजी

11

श्रेयांसनाथ

गेंडा

सम्मेद शिखरजी

12

वासुपूज्य

भैंसा

चम्पापुरी

13

विमलनाथ

सूअर (वराह)

सम्मेद शिखरजी

14

अनंतनाथ

सेही (या बाज)

सम्मेद शिखरजी

15

धर्मनाथ

वज्रदंड

सम्मेद शिखरजी

16

शांतिनाथ

हिरण

सम्मेद शिखरजी

17

 कुंथुनाथ

बकरा

सम्मेद शिखरजी

18

अरनाथ

मछली (या नंदावर्त)

सम्मेद शिखरजी

19

मल्लिनाथ

कलश

सम्मेद शिखरजी

20

मुनिसुव्रतनाथ

कछुआ

सम्मेद शिखरजी

21

नमिनाथ

नीलकमल

सम्मेद शिखरजी

22

नेमिनाथ (अरिष्टनेमि)

शंख

गिरनार पर्वत

23

पार्श्वनाथ

सर्प (सांप)

सम्मेद शिखरजी

24

 महावीर स्वामी

सिंह (शेर)

पावापुरी

निष्कर्ष (Conclusion)

संक्षेप में कहा जाए तो जैन धर्म किसी एक व्यक्ति द्वारा स्थापित किया गया धर्म नहीं है, बल्कि यह 24 तीर्थंकरों के दिव्य ज्ञान और प्रयासों का परिणाम है। जहाँ इसके पहले तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ने इस पवित्र मार्ग की नींव रखी, वहीं २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी ने इसे समाज में फैलाया और एक नई दिशा दी। इसी कारण महावीर स्वामी को जैन धर्म का 'वास्तविक संस्थापक' या पुनरुद्धारक माना जाता है।

 जैन धर्म का इतिहास हमें सिखाता है कि सत्य और आत्मा की शुद्धि ही जीवन का परम लक्ष्य है। कृपया कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर बताएं कि आपको इस ब्लॉग पर जैन धर्म के बारे में दी गई जानकारी कैसी लगी।

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